जय गणेश गिरिजा सुवन मंगल मूल सुजान !
कहत अयोध्या दास तुम देव अभय वरदान !
जय गिरिजा पति दीनदयाला सदा करत संतान प्रतिपाला !
कहत अयोध्या दास तुम देव अभय वरदान !
जय गिरिजा पति दीनदयाला सदा करत संतान प्रतिपाला !
भाला चंद्रमा सोहत नीके कानन कुंडल नागफनी के !
अंगा गौर शिरा गंगा बहाए मुण्डमाला तन छारा लगाये !
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहें छवि को देखा नागा मुनि मोहें !
मैना मातु की हवई दुलारी वामा अंगा सोहत छवि न्यारी !
करा त्रिशूल सोहत छवि भरी करत सदा शत्रुन छायकारी !
नंदी गणेश सोहें तहां कैसे सागर मध्य कमल हैं जैसे !
कार्तिक श्याम और गणराऊ या छवि को कही जाता ना काऊ !
देवन जबही जाया पुकारा तबाही दुख प्रभु आप निवारा !
किया उपद्रव तारक भारी देवन सब मिली तुम्ही जुहारी !